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जिले में पहुंची इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च परियोजना को लेकर वैज्ञानिकों की जांच टीम, आर्सेनिक अब जल समेत मिट्टी व खाद्यानों तक पहुंचा

जागरूकता से होगा बचाव. आर्सेनिक से बचाव को लेकर निंबु पानी का सेवन के साथ करें सलाद का उपयोग. अधिक...

जागरूकता से होगा बचाव. आर्सेनिक से बचाव को लेकर निंबु पानी का सेवन के साथ करें सलाद का उपयोग. अधिक आर्सेनिक की मात्रा मां के दूध में, जो बच्चों के मानसिक विकास को कर रहीं है प्रभावित

डुमरांव. मंगलवार को इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च परियोजना को लेकर वैज्ञानिकों की जांच टीम जिले में पहुंची. इस दौरान चुरामनपुर, तिलक राय के हाता, भिक्षु डेरा सहित कई गांवों में शिविर लगाकर लोगों की जांच टीम द्वारा की गई. महावीर कैंसर संस्थान के वरीय वैज्ञानिक डा. अरुण कुमार ने बताया कि ब्लड, नाखून, बाल, शुगर, बीपी सहित क्षेत्र में उपजे खाद्यानों की भी जांच की जा रही है.

वीर कुंवर सिंह कृषि कालेज में बैठक के दौरान डा. कुमार ने बताया कि आर्सेनिक की उपज भूगर्भ से निकले जल के कारण हुई. पहले लोग कुंए, तालाब व पानी के बाह्य स्त्रोतों पर आश्रित थे, तब आर्सेनिक की मात्रा इतनी नही थी.

लेकिन जैसे जैसे मानवीय जीवन आधुनिकता की मांग बढ़ने लगी. शुद्धता के लिहाज से बाह्य जलस्रोतों की जगह भूगर्भीय जलस्रोतों पर खासा ध्यान दिया जाने लगा. हैंडपंप और मोटर लगने लगे, तभी आर्सेनिक भी मानवीय दिनचर्या में प्रवेश कर गया. डा. कुमार ने बताया कि आर्सेनिक से बचाव को लेकर लोगों को निंबु पानी के सेवन और सलाद का उपयोग करना चाहिए.

वैज्ञानिकों के टीम की रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे

लोगों द्वारा आर्सेनिक युक्त पानी पीने के कारण कई तरह बीमारियों की चपेट लगातार आ रहे हैं. जिले के कई गांवों में भूजल में आर्सेनिक व लेड तत्व पाए जाने की पुष्टि वैज्ञानिकों ने की. सबसे ज्यादा गंगा तटीय इलाके प्रभावित हैं. इन दुष्प्रभावों को जाने के लिए सरकार ने 299 करोड़ की परियोजना तैयार की थी, जहां जांचने वाली वैज्ञानिकों के टीम की रिपोर्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं.

रिर्पोट में बताया गया है कि आर्सेनिक एक ऐसा विषैला तत्व है, जिसका अधिक मात्रा में सेवन किया जाए तो, यह कैंसर समेत कई तरह की बीमारियों के चपेट में आ सकते है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पीने के पानी में आर्सेनिक की प्रति लीटर मात्रा शून्य दशमलव शून्य एक मि.ग्रा. तय की है, जबकि भारत सरकार ने शून्य दशमलव शून्य पांच मि.ग्रा. तक आर्सेनिक का मानक तय किया है. पीने वाले पानी में इससे अधिक आर्सेनिक स्वास्थ्य के लिए जान लेवा साबित हो सकता है.

आर्सेनिक अब जल समेत मिट्टी व खाद्यानों तक पहुंचा

वैज्ञानिक डा. कुमार ने बताया कि हिमालय से निकलने वाले नदियों में शामिल गाद, आर्सेनिक में खास कारगर होता है. कई वर्षों पहले उपजे आर्सेनिक के दुष्प्रभाव ने अब अपना असली रंग दिखाने से आज कैंसर, डायबिटीज, बीपी, थायराइड सहित अन्य बिमारियों का कारण आर्सेनिक हैं. बैक्टीरिया रिड्रक्शन के कारण आर्सेनिक अब जल समेत मिट्टी व खाद्यानों तक पहुंच गया.

आर्सेनिक युक्त मोटर के पानी से किसान फसलों को सिंचित कर रहे हैं, ऐसी फसलों का सेवन भी निश्चित ही मानव सेहत के लिए खतरनाक है. डा. कुमार ने बताया कि पिछले शोध के दौरान जिले में सबसे अधिक आर्सेनिक की मात्रा सिमरी दूधीपट्टी में एक किसान के घर मिली, जिसकी मानक 1928 पीपीबी थी.

माताओं के स्तन के दूध में आर्सेनिक से बच्चों के मानसिक विकास में समस्या

डा. अरुण कुमार की टीम ने जीएसआई की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2021 में जिले के 80 माताओं के स्तन के दूध में आर्सेनिक के मात्रा की जांच की थी, जहां यह पाया था कि इस दूध में आर्सेनिक की मात्रा सबसे अधिक बड़का राजपुर की एक महिला में 211 पीपीबी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दूध में आर्सेनिक की मात्रा सिर्फ 0.64 पीपीबी होनी चाहिए.

नवजात बच्चें की मां के दूध के साथ हुई इस शोध में सबसे ज्यादा पीपीबी खगड़िया के मथार गांव की एक महिला में पाया गया, जिसका मानक 421 पीपीबी था. डा. कुमार ने बताया कि मानक से कई हजार गुना अधिक आर्सेनिक की मात्रा मां के दूध में पाई जा रही है, जो बच्चों के मानसिक विकास को प्रभावित कर रही है. इससे बच्चों के मानसिक विकास में समस्या आ रही है.

तैयार बैक्टीरिया के छिड़काव से आर्सेनिक व लेड के दुष्प्रभाव होगा खत्म

डा. अरूण कुमार ने बताया कि सबौर कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डा. सुनील कुमार ने ऐसी बैक्टीरिया तैयार किया है, जो व्यापक स्तर पर छिड़काव होने से आर्सेनिक और लेड के दुष्प्रभावों को खत्म करेगा. इसके अलावे टीम निरंतर गंगा के तटीय इलाकों में शोध पर लगी हुई है. दो सालों में आर्सेनिक की कितनी मात्रा में बढ़ोतरी हुई है.

मंगलवार को इन प्रयासों में वीर कुंवर सिंह कृषि कालेज के वैज्ञानिकों ने अपना सहयोग करने की बात कहीं. कालेज प्राचार्य डा मुकेश सिन्हा ने बताया कि आधुनिकता के इस युग में लोगों को कैसे सुरक्षित जीवनशैली की ओर ले जाए, यहीं उनका भी मुख्य उदेश्स है. टीम में डा. उदय कुमार, डा. प्रशांत कुमार, सुरभि सुमन, विद्या कुमारी सहित अन्य उपस्थित रहें.

न्यूज़ डेस्क

Author at DUMRAON NEWS EXPRESS

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