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रोज़ की पहली दस्तक, बच्चों के चेहरे पर मुस्कान : वीणा कुमारी जी की ओर से एक अनोखी पहल

सीतामढ़ी। विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने और उनमें जिम्मेदारी, आत्मविश्वास तथा विद्यालय के प्रति अपनापन विकसित करने के लिए...

सीतामढ़ी। विद्यालयों में बच्चों की उपस्थिति बढ़ाने और उनमें जिम्मेदारी, आत्मविश्वास तथा विद्यालय के प्रति अपनापन विकसित करने के लिए छोटे-छोटे नवाचार भी बड़ा प्रभाव छोड़ सकते हैं। ऐसा ही एक अभिनव प्रयास विद्यालय में देखने को मिल रहा है, जहाँ रोज़ सबसे पहले विद्यालय पहुँचने वाले बच्चों को सेल्फी लेने का अवसर दिया जाता है।

यह पहल देखने में भले ही छोटी लगे, लेकिन इसके पीछे बच्चों को प्रोत्साहित करने और उनके भीतर सकारात्मक आदतों को विकसित करने का सुंदर उद्देश्य छिपा है। प्रतिदिन जो बच्चा सबसे पहले विद्यालय पहुँचता है, उसे शिक्षक के साथ सेल्फी लेने या सेल्फी बनाने का अवसर मिलता है। इससे बच्चे के लिए विद्यालय का पहला अनुभव ही खुशी, सम्मान और उपलब्धि की भावना से जुड़ जाता है।

बच्चों में समय की पाबंदी का विकास

इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि बच्चों में समय पर विद्यालय आने की आदत विकसित होती है। जब बच्चों को पता होता है कि समय से पहले विद्यालय पहुँचने पर उन्हें विशेष अवसर मिलेगा, तो वे देर से आने के बजाय समय का ध्यान रखने लगते हैं।

धीरे-धीरे यह आदत केवल सेल्फी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बच्चे समय के महत्व को समझने लगते हैं। उनमें नियमितता और अनुशासन की भावना मजबूत होती है।

‘मैं भी खास हूँ’ का भाव

अक्सर विद्यालय में पुरस्कार या मंच का अवसर कुछ बच्चों तक ही सीमित रह जाता है। लेकिन इस पहल में प्रतिदिन अलग-अलग बच्चे आगे आते हैं। इससे बच्चों में यह भावना पैदा होती है कि “मैं भी महत्वपूर्ण हूँ, मेरी भी पहचान है और मेरी भी उपलब्धि मायने रखती है।”

विशेषकर संकोची बच्चे जब शिक्षक के साथ सेल्फी लेते हैं, तो उनमें आत्मविश्वास बढ़ता है। उन्हें लगता है कि शिक्षक उन्हें देख रहे हैं, उनकी मेहनत को पहचान रहे हैं और उनकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है।

शिक्षक और बच्चों के बीच बढ़ता भावनात्मक जुड़ाव

सेल्फी यहाँ केवल तस्वीर नहीं है, बल्कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संवाद और अपनत्व का माध्यम बन जाती है। बच्चे शिक्षक के पास सहज होकर आते हैं, बातचीत करते हैं और अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ साझा करते हैं।

इससे विद्यालय का वातावरण अधिक आत्मीय और बाल-मित्र बनता है। बच्चे विद्यालय को केवल पढ़ाई की जगह न मानकर अपनेपन और खुशी से जुड़ी जगह के रूप में देखने लगते हैं।

नेतृत्व और जिम्मेदारी की भावना

जब किसी बच्चे को शिक्षक का मोबाइल देकर सेल्फी लेने का अवसर मिलता है, तो वह स्वयं को जिम्मेदार महसूस करता है। वह तस्वीर लेने का तरीका सीखता है, सही फ्रेम बनाने की कोशिश करता है और अपने कार्य को बेहतर करने का प्रयास करता है।

इस छोटी-सी गतिविधि के माध्यम से निर्णय लेने, जिम्मेदारी निभाने, तकनीक के रचनात्मक उपयोग और नेतृत्व जैसी क्षमताओं को भी बढ़ावा मिल सकता है।

स्वस्थ प्रतिस्पर्धा, लेकिन सकारात्मक तरीके से

बच्चों में एक स्वाभाविक उत्सुकता पैदा होती है कि आज सबसे पहले विद्यालय कौन पहुँचेगा। यदि शिक्षक इसे सकारात्मक तरीके से संचालित करें, तो यह प्रतिस्पर्धा बच्चों के बीच किसी को नीचा दिखाने वाली प्रतियोगिता न बनकर समय पर आने और नियमित रहने की प्रेरणा बन सकती है।

यहाँ उद्देश्य “कौन जीता” से अधिक महत्वपूर्ण है—“कौन समय का सम्मान करते हुए विद्यालय आया।”

अभिभावकों पर भी सकारात्मक प्रभाव

जब बच्चा घर जाकर उत्साह से बताता है कि आज वह विद्यालय में सबसे पहले पहुँचा और उसे शिक्षक के साथ सेल्फी लेने का अवसर मिला, तो अभिभावकों को भी बच्चे के समय और विद्यालय के प्रति उसके व्यवहार के बारे में सकारात्मक संदेश मिलता है।

इससे घर और विद्यालय दोनों मिलकर बच्चे में नियमितता और जिम्मेदारी की आदत को मजबूत कर सकते हैं।

सोशल मीडिया से आगे, सीखने का माध्यम

आज के डिजिटल युग में सेल्फी बच्चों के लिए आकर्षण का विषय है। इस आकर्षण को केवल मनोरंजन तक सीमित रखने के बजाय यदि उसे शिक्षा, अनुशासन और सकारात्मक व्यवहार से जोड़ दिया जाए, तो डिजिटल माध्यम भी सीखने का साधन बन सकता है।

इस पहल की खूबसूरती यही है कि एक साधारण-सी सेल्फी के पीछे समय की पाबंदी, आत्मविश्वास, जिम्मेदारी, संवाद, तकनीकी समझ और विद्यालय के प्रति अपनत्व जैसे कई शैक्षिक उद्देश्य पूरे हो रहे हैं।

सबसे बड़ी उपलब्धि—बच्चे की मुस्कान

हर दिन सबसे पहले आने वाला बच्चा जब मुस्कुराते हुए सेल्फी लेता है, तो वह तस्वीर केवल उस दिन की याद नहीं रहती। वह बच्चे के मन में यह संदेश भी छोड़ती है कि उसकी उपस्थिति महत्वपूर्ण है और उसकी अच्छी आदतों को पहचान मिलती है।

शिक्षा में नवाचार हमेशा बड़े संसाधनों से नहीं होते। कभी-कभी एक मुस्कान, एक अवसर और थोड़ी-सी सराहना भी बच्चे के भीतर बड़ा बदलाव ला सकती है।

यही इस पहल का सार है—“पहले विद्यालय आओ, अपनी पहचान बनाओ और हर दिन सीखने की नई शुरुआत करो।”

न्यूज़ डेस्क

Author at DUMRAON NEWS EXPRESS

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