मुजफ्फरपुर : अपनों ने किया किनारा तो एक -दूसरे का बने सहारा

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मुजफ्फरपुर। कुढ़नी प्रखंड के केशोपुर गांव की आरती के अदम्य साहस का परिणाम है कि उन्होंने टीबी से जंग जीती है। यह जंग आरती ने सिर्फ टीबी से ही नहीं बल्कि अपने आलोचकों से भी जीती है, जिन्होंने हर पल उन्हें हेय नजरों से देखा। आरती की टीबी से जंग की शुरुआत उनसे नहीं बल्कि उनके पति जगन्नाथ से शुरु हुई थी. इस बाबत आरती कहती हैं एक नई नवेली दुल्हन की तरह जब वह अपने ससुराल आयी तो उनकी बहुत आकांक्षाएं थी। शादी के दूसरे दिन ही आरती को पता चल गया कि उनके पति टीबी से पीड़ित हैं।

आरती बताती हैं इन सभी चीजों के लिए ससुराल वाले उन्हें ही जिम्मेवार ठहराते थे। साथ ही ससुराल वालों ने उन्हें अपने पति से अलग हो जाने का भी दवाब बनाया . आरती ने बताया टीबी की पुष्टि होने के बाद उनके पति ने भी सरकारी अस्पताल से मिले दवाओं का सेवन शुरू कर दिया था. लेकिन इस दौरान उन्हें टीबी के विषय में अधिक जानकारी नहीं थी. बस इतना जरुर पता था कि यदि नियमित तौर पर टीबी की दवाएं खायी जाए तो यह रोग ठीक हो सकता है.   

जब खुद हुई टीबी की शिकार

आरती कहती हैं शादी के एक साल बाद ही उन्हें बेटी हुई। इस बात से ससुराल पक्ष से और तनाव बढ़ता ही गया। उन्हें दूसरा बच्चा होने के बाद जनवरी 2014 में वह बीमार हो गयी. स्थिति गंभीर होने के कारण उन्होंने चिकित्सकों से भी संपर्क किया. चिकित्सक ने टायफायड होने की बात कह दवा चलाने लगे. फिर भी मेर उनकी  हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। आरती ने बताया उस दौरान उनका वजन तेजी से कम होने लगा था। लगभग 11 महीने में उनका वजन 60 किलोग्राम से घटकर 27 किलोग्राम हो गया था।

लगातार खांसी होने की वजह से वह अच्छे से बैठ भी नहीं पा रही थीं। उन्होंने बताया कुढ़नी पीएचसी के एसटीएस ने उनके लक्षणों के आधार पर उन्हें टीबी जाँच कराने की सलाह दी. जांच के बाद इस बात की पुष्टि हुयी कि वह टीबी से ग्रसित हैं. इसके बाद चिकित्सकीय सलाह पर उन्होंने टीबी का दवाओं का सेवन शुरू किया. वह बताती हैं 2017 तक वह टीबी की दवा खाती रही। दवाओं का असर दिखने लगा एवं दवा के कोर्स खत्म होने के बाद वह बिल्कुल स्वस्थ हो गयी.  

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नेशनल टीबी फोरम का भी बन चुकी हैं हिस्सा

आरती ने जब 2017 में इस बीमारी से जंग जीती तो अपने क्षेत्र में ही उन्होंने काउंसलर के रुप में अपनी सेवा देना शुरु किया। अपने अनुभव से लोगों को शेयर करती और लक्षण दिखने पर टीबी की जांच के लिए भी प्रेरित करती। वर्ष 2018 में उन्होंने टीबी चैंपियन के रुप में वर्ल्ड टीबी डे के मौके पर टीबी चैंपियन के रुप में नेशनल टीबी फोरम में भी अपने अनुभव को शेयर किया। वहां उन्हें चैंपियन के रुप में सम्मानित भी किया गया। आरती ने हाल ही में 20 सदस्यीय टीबी मुक्त वाहिनी नाम से अपना एक नेटवर्क भी बनाया है।  वह कहती हैं अब उनका और उनके पति आजीवन टीबी पर ही जागरुकता फैलाएगें। 

टीबी का सही ईलाज कराएं

आरती कहती हैं दूसरे रोगी भी टीबी का पता लगने के बाद इसके उपचार में गंभीरता दिखाएं. आरती अपने भयावह अनुभवों को याद करते हुए कहती हैं किसी व्यक्ति को पता चलता है कि उन्हें टीबी है या उनमें इसके लक्षण दिखाई देते हैं, तो उचित सलाह के लिए वह नजदीकी सरकारी अस्पताल जरुर जाएँ. टीबी आज के दौर में आसानी से ठीक हो सकता है. इसके लक्षणों को अनदेखा नहीं करें एवं यह भी नहीं सोचे के आस-पास के लोग भेदभाव कर सकते हैं.

आरती ने बताया यदि किसी को दो हफ्तों से अधिक समय से बुखार हो, खांसी आ रही हो एवं  वजन कम हो रहा हो तो तुरंत ही सरकारी अस्पताल जाएं और वहां अपने बलगम की जांच कराएं। रिपोर्ट में टीबी की पुष्टि होने पर दवाएं भी आपको वहीं से मुफ्त में मिलेगीं। दवा तब तक खाएं जब तक डॉक्टर दवा खाने से मना नहीं करें। साथ ही सरकार द्वारा टीबी मरीजों के पोषण के लिए ईलाज की अवधि में प्रति माह 500 रुपये की राशि देने का प्रावधान भी किया गया है। सही समय पर टीबी का ईलाज कभी जानलेवा नहीं बन सकता।

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