किशोरियों में कुपोषण का एक कारण लैंगिक भेदभाव भी, जिसे खत्म करने की जरूरत

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बक्सर | कुपोषण को दूर करने के लिए स्वास्थ्य विभाग और आईसीडीएस विभाग के द्वारा कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। जिसका लाभ बच्चों, किशोरियों और गर्भवती महिलाओं को मिलता है। लेकिन कुपोषण की मुख्य समस्या का निदान तभी हो सकता है, जब लोग स्वयं अपने परिवार के सदस्यों को कुपोषण से बचाने के लिए जागरूक होंगे। अमूमन देखा जाता है कि गर्भवती महिलाओं के कुपोषित होने के कारण बच्चे भी कुपोषित हो जाते हैं। जो बच्चों के पोषण और उनके शारीरिक और मानसिक विकास में भी बड़ी बाधा है। इसलिए यदि गर्भवती महिलाओं को गर्भ धारण से पहले और प्रसव के बाद तक सुपोषित रखने की जरूरत है। ताकि, प्रसव के बाद नवजात बच्चा भी सुपोषित रहे। आज के दौर में जब महिलाएं स्वस्थ माता बनने तक हीं सीमित नहीं, बल्कि दूसरी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सफलता से उठा रही तो ऐसे में किशोरियों के स्वास्थ्य के प्रति किसी भी प्रकार की लापरवाही उनके भविष्य और सुरक्षित मातृत्व के लिए बाधक साबित हो सकती है।

सुपोषित माता ही होती हैं स्वस्थ शिशु की जननी

राष्ट्रीय पोषण मिशन के जिला समन्वयक महेंद्र कुमार ने बताया, पोषण की किशोरियों के स्वास्थ्य व स्वस्थ मातृत्व में सबसे अहम भूमिका है। इस दौरान आहार में जरूरी पोषक तत्वों और आयरन की कमी को पूरा कर रक्ताल्पता और दूसरे पोषण संबन्धित समस्याओं को दूर किया जा सकता है। जिससे भविष्य में प्रसव के दौरान व मां बनने के बाद संभावित जटिलताओं में काफ़ी कमी आ जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार लगभग 80 प्रतिशत शारीरिक विकास किशोरावस्था में हो जाता है, इसलिए ना सिर्फ सुरक्षित मातृत्व बल्कि मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए भी किशोरियां के पोषण की जरूरतों को नजरंदाज करना नुकसानदायक हो सकता है। उनके भोजन में रोजाना कैल्सियम, आयरन, विटामिन ए, विटामिन बी-12, फोलिक एसिड, विटामिन बी-3, विटामिन सी एवं आयोडीन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी को पूरा करें तथा हरी साग-सब्जी, मौसमी फ़ल, गुड़ एवं भुना चना, दूध, अंडे, मांस मछ्ली और रोग प्रतिरोधक शक्ति के लिए खट्टे फल शामिल करें।

बच्चियों के अभिभावकों को जागरूक होने की जरूरत

आईसीडीएस की डीपीओ तरणि कुमारी ने बताया, आईसीडीएस के द्वारा जिले के सभी आंगनबाड़ी केंद्र के पोषण क्षेत्र में गर्भवतियों और बच्चों को पोषण का लाभ दिया जाता है। ताकि, जिले से कुपोषण को पूरी तरह से मिटाया जा सके। उन्होंने कहा कि स्त्री जननी होती है और नवजात को जन्म देकर वंश को आगे बढ़ाने की धूरि मानी जाती। लेकिन, अभी भी समाज में कई लोग ऐसे हैं, जो पुत्र मोह में अपनी बेटियों की सेहत और उसके पोषण को लेकर उदासीन और लापरवाह दिखते हैं। यह सभी को समझने की जरूरत है कि एक सुपोषित किशोरी ही आगे चलकर एक स्वस्थ बच्चे की जननी हो सकती है। किशोरी एवं मातृ पोषण के अभाव में ही नवजात एवं माता की मृत्यु अधिकतर देखी जाती हैं। बेटा हो या बेटी, दोनों के पोषित और स्वस्थ होने से ही एक स्वस्थ एवं प्रगतिशील समाज की कल्पना की जा सकती है।

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